उर्दू का अधिकाधिक इस्तेमाल और विकास करें : आसमा खातून

जिला स्तरीय उर्दू कार्यशाला एवं सेमिनार सह मुशायरा का आयोजनउर्दू की तरक्की और इसकी समृद्ध विरासत से युवाओं की जानकारी देने को लेकर जिला उर्दू भाषा कोषांग के बैनर तले नागरी प्रचारिणी सभागार में जिला स्तरीय उर्दू कार्यशाला एवं सेमिनार सह मुशायरा का आयोजन किया गया। इसमें बिहार के विभिन्न जिलों के साहित्यकार शामिल हुए। कार्यक्रम का उद्घाटन उप विकास आयुक्त डा. अनुपमा सिंह, अपर समाहर्ता प्रमोद कुमार, अनुमंडल पदाधिकारी रश्मि सिन्हा, जिला उर्दू भाषा कोषांग की नोडल पदाधिकारी आसमा खातून समेत अन्य पदाधिकारियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। वहीं उप विकास आयुक्त द्वारा जिला उर्दूनामा पुस्तक का विमोचन किया।

इस अवसर पर आसमा खातून ने अतिथियों के स्वागत के पश्चात कहा कि उर्दू एक तहजीब व तमीज की भाषा है। ये पूरे समाज की भाषा है। इसका अधिकाधिक इस्तेमाल करें और विकास करें। कार्यक्रम में कफील अनवर ने उर्दू के प्रचार-प्रसार और तरक्की, इसरार आलम सैफी ने उर्दू जुबान हिन्दुस्तानी तहजीब व सकाफत का मुशतरका सरमाया और अधिवक्ता जमाल युसूफ ने उर्दू भाषा की तरक्की में गजल की अहमियत विषय पर अपना आलेख पाठ किया। वहीं छात्रों में हाफिज काशिफ रजा ने उर्दू गलज की मकबूलियत, शफी अनवर,नौशाद आलम ने उर्दू जुबान की अहमियत, मो.गुलाम रसूल दहेज एक सामाजिक बुराई और शमशाद आलम ने इल्म की अहमियत विषय पर अपना विचार प्रकट किया।

वहीं मुशायरा में शंकर कैमूरी ने अपनी रचनाओं से लोगों को प्रभावित किया- मेरे भारत की है पहचान, ये हिन्दू-मुस्लिम की है जान, है कहता गालिब का दीवान, कि उर्दू है मेरा इमान, मैं उर्दू बोल रहा हूं…। मोइन गिरीडीहवी की रचना थी- ताकत अगर मिली है तो रखिए संभाल कर, कमजोर को कभी भी डराया न कीजिए, रहने तो दीजिए सदा चैनों सुकुन से, नफरत की आग आप लगाया न कीजिए। शायरा हेना नसीम का शेर था- प्यार के गीत यूं गुनगुनाते रहे, जिंदगी भर सदा मुस्कुराते रहें। डा.शमां नाजनीन नाजां ने शेर पढ़ा- संग को आइना साजी का हुनर दो नाजां, खौफ तबलीए हालात से बाहर निकलेगे। कफील अनवर ने शेर पढ़ा- जो बात दिल में हो होंठो पे भी सजा लेना, मैं हकपरस्त हूं सच का ख्याल रखती हूं। नेजाम अख्तर ने ये शेर पढ़ा- ये कैसा जहां है- ये कैसा जहां है, जो सोचा नहीं था वो दौरे खिजां है। मीम आसिफ आरवी ने अपनी नज्म में कहा-क्यों बहुत दूर तुमसे है इल्म और फन, किताब और कापी से तुमको जलन, बस यही वारनिंग है संभालो चलन, यूं बल्फ पर बल्फ तुम न दो माई सन। डा.अताउर्रहमान अता का ये शेर रहा- एक तमन्ना है दिल में मुद्दत से, फूल सारे रहे मोहब्बत से। जीशान भागलपुरी ने अपनी रचना पढ़ी- सिकंदर ने चमन को जंग का मैदान लिखा है, तो हमने भी गुलों को फतह का सामान लिखा है, हमारा सर हमेशा शान से उठा है, एै लोगों हमारे घर के दरवाजे पर हिन्दुस्तान लिखा है। हेना नसीम ने तरन्नुम में गजल पेश किया- प्यार के गीत यूं गुनगुनाते रहे, जिंदगी भर सदा मुस्कुराते रहे। एस.एम.आजाद का ये शेर था- अपनी आंखों में हंसी शाम व शहर रखते हैं, हम भी जीने का ये अंदाज दिगर रखते हैं। डा. मो.शहनवाज आलम ने गजल पढ़ी- अगर है जिंदा जमीर तेरा तो फिर नफस का असीर क्यों है, कफस नफस का बड़ा सुनहरा सो फंस न जाना सवाल करना। इनके अलावा सुल्तान मुजफ्फर आज़ाद, अताउर्रहमान अता, फातिमा जबीं, रसिक भोजपुरी आदि ने भी अपनी गजलें व नज्में सुनाईं। मंच संचालन चर्चित कवि शंकर कैमूरी और सहायक उर्दू अनुवादक वसीम अशरफ ने किया।